अंतर्जातीय विवाह योजना में बड़ा फर्जीवाड़ा : सरकारी पैसे के लिए पत्नी की जाति बदली, रायपुर नगर निगम के दस्तावेजों से खुला राज!"
Rameshvar Vaishnaw
Sat, Jul 4, 2026
"सरकारी खजाने पर डाका: नहीं थे अंतर्जातीय, फिर भी बने! शादी के कागजों में 'जादुई' बदलाव ने खोली पोल।"
रायपुर/बिलाईगढ़/सारंगढ़: सरकारी योजनाओं में सेंधमारी और 'मलाई' खाने का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आ रहा है, जिसने प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा दिया है। सूत्रों से मिली बेहद चौंकाने वाली जानकारी के मुताबिक, लड़का भी अनुसूचित जाति (SC) का और लड़की भी अनुसूचित जाति (SC) की, लेकिन 'अंतर्जातीय विवाह प्रोत्साहन योजना' के तहत मिलने वाली मोटी रकम पर डाका डालने के लिए एक ऐसा खेल रचा गया जिसे जानकर आप दंग रह जाएंगे।
इस खेल के मुख्य सूत्रधार बताए जा रहे हैं घनश्याम निराला, जिन्होंने अपनी पत्नी का सरनेम (जाति) बदलकर 'शर्मा' (सामान्य/अन्य वर्ग) दर्शाया, ताकि वे खुद को अंतर्जातीय दंपत्ति साबित कर सरकारी खजाने से पैसा ऐंठ सकें।
दस्तावेज़ खुद बयां कर रहे हैं कहानी (चॉइस केंद्र का बड़ा खुलासा)
हमारे हाथ लगे आधिकारिक दस्तावेज़ों (आवेदन संदर्भ क्रमांक: 2303012201000562) के मुताबिक, रायपुर नगर निगम से जारी विवाह पंजीयन प्रमाण पत्र (पंजीकरण संख्या 2022-01-001070) में स्पष्ट तौर पर दूल्हे का नाम घनश्याम निराला (पिता: श्री तीजराम निराला, निवासी: ग्राम सिंघनपुर, तहसील सारंगढ़, जिला रायगढ़) और दुल्हन का नाम श्रीमती सरोजनी शर्मा (पिता: श्री रामानंद शर्मा, निवासी: ग्राम मधुबन खुर्द, तहसील बिलाईगढ़, जिला बलौदाबाजार) दर्ज कराया गया है। यह विवाह दिनांक 24/01/2022 को होना दिखाया गया है, जिसे 16 फरवरी 2022 को डिजिटल रूप से अनुमोदित किया गया।
सूत्रों का दावा है कि असलियत में लड़की 'शर्मा' (ब्राह्मण/सामान्य वर्ग) नहीं, बल्कि खुद अनुसूचित जाति की है। लेकिन विवाह प्रमाण पत्र में 'शर्मा' सरनेम का यह जादुई बदलाव महज़ एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि लाखों रुपये की अंतर्जातीय विवाह योजना का लाभ पाने के लिए किया गया एक सोची-समझी साजिश और बड़ा फर्जीवाड़ा है।
जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत? बिना 'लक्ष्मी' की कृपा के कैसे बदला सरनेम!
अब सवाल यह उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ नागरिक सेवा नियमों की धज्जियां उड़ाकर यह फर्जीवाड़ा अकेले घनश्याम निराला ने कर दिया? जवाब है— कतई नहीं! विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों और बाबुओं की मिलीभगत के बिना शासकीय रिकॉर्ड और प्रमाण पत्रों में ऐसा हेरफेर मुमकिन ही नहीं है। आरोप लग रहे हैं कि "पैसे फेंक तमाशा देख" की तर्ज पर चांदी के सिक्कों की चमक दिखाकर अधिकारियों की आंख पर पट्टी बांधी गई और बिना जमीनी सत्यापन के यह खेल होने दिया गया। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा जिम्मेदार वह विभाग और उसके आला अधिकारी हैं, जिनकी नाक के नीचे यह फर्जीवाड़ा फला-फूला।
क्या होगी राज्य स्तरीय जांच, या 'अपनों' को बचा लेगा महकमा?
इस बड़े खुलासे के बाद अब जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यह तैर रहा है: क्या इस हाई-प्रोफाइल फर्जीवाड़े की जांच कोई निष्पक्ष राज्य स्तरीय टीम करेगी? आमतौर पर देखा गया है कि जब भी किसी विभाग के अधिकारियों पर आंच आती है, तो महकमा अपने ही 'भ्रष्ट' साथियों को बचाने के लिए लीपापोती का खेल शुरू कर देता है। फाइलों को दबाने और जांच को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिशें तेज हो जाती हैं। लेकिन इस बार दस्तावेज़ ऑन-रिकॉर्ड हैं और 'चॉइस केंद्र' के माध्यम से डिजिटल रूप से प्रमाणित हैं।
अब देखना बेहद दिलचस्प होगा कि शासन-प्रशासन इस मामले पर क्या रुख अपनाता है? क्या भ्रष्ट अधिकारियों और फर्जीवाड़ा करने वाले इस जोड़े पर 'बेबाक और बेधड़क' कार्रवाई होगी, या फिर पैसे के दम पर इस मामले को भी रफा-दफा कर दिया जाएगा? फिलहाल यह मामला प्रशासन के लिए एक खुली चुनौती है क्या सच सामने आ पाएगा।
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