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प्रतापपुर में 1.86 हेक्टेयर सरकारी जमीन का ‘खेल’, कानून के मुंह पर तमाचा!

ओड़गी में खुली नई शराब दुकान, टारगेट के चक्कर में आबकारी विभाग का ‘रंगीन’ कारनामा!

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हाकिम का ‘स्टे’ बना रद्दी, जमीन पर सीना ताने खड़ी हो रही इमारतें : प्रतापपुर में 1.86 हेक्टेयर सरकारी जमीन का ‘खेल’, कानून के मुंह पर तमाचा!

Subhas Gupta

Tue, Oct 27, 2026

सूरजपुर। राजस्व विभाग की छत्रछाया में कानून की धज्जियां कैसे उड़ाई जाती हैं, इसकी जीती-जागती मिसाल देखनी हो तो ग्राम घाटपेण्डारी पहुंच जाइए! यहां सिस्टम की आंख पर ऐसा मोतियाबिंद चढ़ा है कि 1.86 हेक्टेयर सरकारी जमीन का बंदरबांट हो गया और साहब लोग केवल कागजों पर 'स्टे' का झुनझुना बजाकर गहरी नींद में सो गए! कोर्ट का आदेश फाइलों में दम तोड़ रहा है और जमीन पर दिन-दहाड़े अवैध निर्माण की ईंटें ठोंकी जा रही हैं।

​गौठान की जमीन पर सजी ‘निजी मुनाफे’ की दुकान

जिस खसरा नंबर 175 (वर्तमान 175/1, 175/2) पर दशकों से गरीब ग्रामीण के मवेशी चरते थे और अरहर-तिली की फसल लहलहाती थी, वहां के राजस्व ‘जादूगरों’ ने ऐसा खेल रचा कि सरकारी जमीन रातों-रात किसी और की झोली में डाल दी गई! फिर क्या था, बाहर से आए रसूखदार राघव ठाकुर (जय श्री राम ऑर्गेनिक्स प्रा. लि.) के नाम पर रजिस्ट्री का ऐसा ताना-बाना बुना गया कि गौठान की पावन धरती देखते ही देखते दो मंजिला लाइन होटल और पेट्रोल पंप के लालच में तब्दील हो गई। जहां कभी गोबर और मिट्टी की महक थी, आज वहां कमीशनखोरी और डीजल के मुनाफे की तेज बदबू आ रही है!

​कलेक्टर की मंजूरी की जरूरत किसे? भू-राजस्व संहिता की उड़ाईं धज्जियां!

छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 का कानून भले ही चिल्ला-चिल्लाकर कहे कि सरकारी या पट्टे की जमीन का व्यावसायिक इस्तेमाल बिना कलेक्टर की अनुमति के अपराध है, पर रसूख के आगे कानून तो वैसे भी घुटने टेक देता है! बिना किसी वैधानिक अनुमति के जमीन का मद बदला गया, होटल चालू हो गया और पेट्रोल पंप की नींव धड़धड़ाकर खड़ी कर दी गई। ऐसा लगता है मानो जिले का नियम-कायदा सिर्फ गरीबों पर डंडा चलाने के लिए बना है, पहुंच वाले तो सरकारी जमीन को अपनी बपौती समझकर निगल रहे हैं!

​अदालत का ‘स्टे’ ऑर्डर बना कागजी खिलौना

एसडीएम न्यायालय ने अपने आदेश में काले अक्षरों में दर्ज किया था कि साल 2003-04 के अभिलेखों के मुताबिक यह जमीन मूलतः 'शासकीय' है और इसका क्रय-विक्रय पूरी तरह संदेहास्पद है। कोर्ट ने मौके पर तुरंत 'यथास्थिति' (Stay) बनाए रखने का सख्त आदेश थमाया था। लेकिन रसूखदारों ने इस अदालती आदेश को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया! आदेश के बाद भी निर्माण कार्य इतनी तेजी से चल रहा है मानो साहबों ने मौखिक रूप से खुली छूट का 'ग्रीन सिग्नल' दे रखा हो।

​कलेक्टर जनदर्शन में दस्तक, क्या जागेगा सोता हुआ तंत्र?

जब स्थानीय अफसरों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, तब बेबस होकर पीड़ित मानसाय पनिका ने कलेक्टर जनदर्शन में अपनी फरियाद का माथा पटका है। सवाल सीधा और कड़वा है—क्या जिला प्रशासन अपने ही एसडीएम के आदेश की आबरू बचा पाएगा? क्या इस अवैध साम्राज्य पर बुलडोजर का पहिया घूमेगा, या फिर रसूख और रुपयों की खनक के आगे यह शिकायत भी किसी अंधेरी अलमारी में हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दी जाएगी? जनता टकटकी लगाए देख रही है कि कानून अंधा है या वाकई गूंगा-बहरा भी हो चुका है!

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