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: खामोश रहिये ......क्योकि यह आपका मामला नही है.......!

Admin

Wed, Sep 9, 2020

सन्दर्भ….. हेमन्त साहू की मौत और इंसाफ का सँघर्ष

खामोश रहिये ......क्योकि यह आपका मामला नही है.......!

सन्दर्भ..... हेमन्त साहू की मौत और इंसाफ का सँघर्ष

राजेश सोनी

साहू गली के सब्जी विक्रेता रामबिलास साहू व छत्रमनी साहू को शायद अब इंसाफ मिल सके......?इंसाफ की यह उम्मीद मृतक हेमन्त साहू की माँ छत्रमनी के उस सँघर्ष के बाद जगी है जब चिलचिलाती धूप व बारिश के बीच बैठ कर कुंभकर्णी नींद में सो रहे पुलिस व प्रशासन को धरने में बैठ कर जगाने का काम किया । पुलिस जाग गई है तभी तो एसआईटी गठित कर नए सिरे से एक महीने से फाइलों में दफन उस कथित हत्या की जांच शुरू की गई है। 31 जुलाई को हेमन्त साहू का शव बिशुनपुर में मिला था। नपा कर्मचारी रहा हेमन्त अपने चार दोस्तो के साथ पार्टी मनाने गया था और वहां से उसकी लाश ही आई। जबकि दोस्त व पुलिस की थ्योरी में हेमन्त ने रेल से कट कर आत्महत्या कर ली ,तो बात क्या हुई कि उसने यह कदम उठाया ..? दोस्तो ने उसे ऐसा करने से रोका क्यो नही ...? जब सब साथ मे गए थे तो रात में उसे अकेले जाने क्यों दिया ...? कई सवाल है जो मामले को सन्देहास्पद बनाते है जो हत्या की ओर इशारा करते है। बात आज इसकी नही है इन सवालों का जबाव पुलिस ढूढेंगी....बात हम सूरजपुर के उस संवेदनहीन समाज की कर रहे है। जहाँ एक गरीब परिवार के नवयुवक की सन्देहास्पद मौत हो जाती है और परिवार हत्या की बात करते हुए न्याय की गुहार करता है पर कोई उसके साथ खड़े होना तो दूर उसकी दर्द भी नही सुनना चाहता । कहने को विपक्ष है जो 15 साल का सत्ता का सुख भोगने के बाद जैसे कोमा में है। उसने शहर की समस्या व सवालों से जैसे मुँह मोड़ लिया है। राजनीत तो फिर भी ठीक है उसे आज वोट की जरूरत नही है इसलिए आम जनता की समस्याओं से वह कोई मतलब नही रखना चाहती पर उस समाज का क्या कहे ....?जिस समाज से वह परिवार वास्ता रखता है उसने भी खामोशी की चादर ओढ़े रखी, क्या समाज के अगुवा केवल फतवा जारी करने तक मतलब रखते है । हर साल समाज मे नेता चुने जाते है जो केवल अपना ओहदा बताते फिरते है मगर ऐसे गरीब गुरबों की आवाज बनने में उन्हें हिचकिचाहट होती है। यही वजह है कि इस परिवार में बेटे के इंसाफ के लिए महिलाओं को मोर्चा सम्हालना पड़ा।  ऐसे नेताओ को देखिए वे पहुचे पर गाल बघार कर निकल लिए फिर क्रेडिट लेने तब पहुँच गए जब उन्हें समझ आ गया कि अब नाखून कटा कर शहीद का दर्जा पाया जा सकता है। बात उनकी भी है जो वार्ड के जनप्रतिनिधी बने या बनाये गए थे वे भी वार्ड से मुँह मोड़ लिए और तो और नगरपालिका जहाँ वह काम करता था उसके संगी साथी भी साथ देने या सवेंदना प्रकट करने में गुरेज कर गए क्या केवल इसलिये कि वह गरीब था.....?

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अंधो के शहर में आईना बेचने से बेहतर है कि उम्मीद करनी चाहिए कि जिसका कोई नही उसका खुदा होता है.....और अब शायद इस परिवार को न्याय मिल जाये...? परन्तु यह सोचना होगा कि शहर की यह खामोशी क्या शहर की सेहत के लिए ठीक है ,ठीक है तभी तो गाड़ी से कुचलने के मामला भी पुलिस दफन करने में सफल हो गई । इंतजार करिये और कई मामले ऐसे ही दफन होते रहेंगे..................?

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