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बादल एक दिन बरसें तो हफ़्ते भर टपकती है महूली आंगनबाड़ी की छत, मंत्री के गढ़ में मासूम बन रहे 'खतरों के खिलाड़ी'

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अजब-गजब सरकारी इंजीनियरिंग : बादल एक दिन बरसें तो हफ़्ते भर टपकती है महूली आंगनबाड़ी की छत, मंत्री के गढ़ में मासूम बन रहे 'खतरों के खिलाड़ी'

Rajesh Soni

Mon, Aug 31, 2026

बाहर से चमचमाता महल, अंदर खंडहर का तिलिस्म; लीपापोती के बजट से अधिकारी तृप्त, बच्चे त्रस्त

हर साल लाखों की 'मरम्मत पूजा' के बाद भी छत छलनी, क्या बड़े हादसे के बाद ही जागेगा कुंभकर्णी प्रशासन?

सूरजपुर। यदि आपको मानसून के बिना भी चौबीसों घंटे 'इनडोर वाटरफॉल' का रोमांच देखना हो, तो सूरजपुर जिले के चांदनी-बिहारपुर क्षेत्र स्थित महूली आंगनबाड़ी केंद्र पधारिए। महिला एवं बाल विकास विभाग और लोक निर्माण की संयुक्त कलाकारी का यह ऐसा नायाब नमूना है, जिसे बाहर से चूना-पुट्टी पोतकर चमका दिया गया है, मगर अंदर घुसते ही यह किसी भूतिया हवेली को भी मात देता नजर आता है। रजिस्टर में दर्ज 99 बच्चों में से जो 45 मासूम रोजाना यहां पहुंचते हैं, वे ककहरा सीखने कम और सिर पर लटकती दरारों के बीच 'यमराज को चकमा देने' की मुफ्त ट्रेनिंग लेने ज्यादा आते हैं।अंदर का हाल

बादल तो चले जाते हैं, छत का 'जलप्रपात' जारी रहता है

विज्ञान के सारे नियम महूली की छत पर आकर दम तोड़ देते हैं। आसमान से बारिश भले एक दिन होकर थम जाए, लेकिन इस जर्जर छत ने पानी को सहेजने का ऐसा अदृश्य सिस्टम बनाया है कि पूरे सात दिन तक बूंद-बूंद टपककर 'जल ही जीवन है' का जीवंत पाठ पढ़ाती रहती है। फिसलन भरे फर्श पर कार्यकर्ता बच्चों को वर्णमाला रटाने के बजाय इस जुगत में लगी रहती हैं कि कौन सा बच्चा कब फिसलकर अस्पताल की दहलीज न नाप ले।

मरम्मत का जादुई गड्ढा: सीमेंट गायब, बजट हजम

ग्रामीणों का कहना है कि पिछले पांच सालों से हर बरसात से पहले मरम्मत और रंग-रोगन के नाम पर लाखों रुपयों का 'हवन' किया जाता है। पर यह समझ से परे है कि सीमेंट दीवार में लगती है या सीधे जिम्मेदारों की तिजोरियों में जमती है। पहली ही फुहार में छत छलनी होकर अपना असली रूप दिखा देती है और दरारें चीख-चीखकर पूछने लगती हैं कि ‘साहब, हमारे हिस्से का पैसा कहां गया?’

'चिराग तले अंधेरा' मंत्री के इलाके में कागजी झुनझुना

विडंबना देखिए कि यह पूरा तमाशा प्रदेश की महिला एवं बाल विकास मंत्री के अपने क्षेत्र में बेखौफ चल रहा है। पिछले साल जब मीडिया ने इस खंडहर की महिमा गाई थी, तब प्रशासन ने नए भवन का एक चमकदार ‘कागजी झुनझुना’ पकड़ाया था। पूरा एक साल बीत गया, झुनझुना आज भी बज रहा है और छत वैसे ही रिस रही है। अब त्रस्त ग्रामीणों ने सूरजपुर कलेक्टर और मंत्री महोदया से सीधी गुहार लगाई है कि किसी बड़े हादसे के बाद शोक जताने और मुआवज़ा बांटने आने से बेहतर होगा कि अभी अपनी नींद तोड़कर नए भवन की नींव रख दी जाए।

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