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ओलावृष्टि : महुआ बर्बाद, वनांचल में रहने वाले परिवारों पर संकट..

Pappu Jayswal

Wed, Apr 8, 2026

सूरजपुर के वनांचल में 10 हजार परिवारों पर संकट, 25 करोड़ से ज्यादा का नुकसान

चांदनी-बिहारपुर. जिले के दूरस्थ वनांचल क्षेत्र चांदनी-बिहारपुर में इस वर्ष बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने आदिवासी जीवन की सबसे बड़ी आर्थिक धुरी ‘महुआ’ को तबाह कर दिया। ‘पीला सोना’ कहे जाने वाले महुआ की करीब 80 प्रतिशत फसल नष्ट हो गई है, जिससे क्षेत्र के 10 हजार से अधिक परिवार सीधे प्रभावित हुए हैं। यह क्षेत्र ऐसा है जहां 30 से अधिक गांवों के ग्रामीण रबी फसल की खेती नहीं करते, बल्कि पूरे सीजन जंगलों में महुआ संग्रहण कर अपनी आजीविका चलाते हैं। लेकिन इस बार प्रकृति की मार ने उनकी सालभर की कमाई छीन ली।

25 करोड़ का सीधा नुकसान, रोजी-रोटी पर संकट

एक अनुमान के मुताबिक, इस बार ओलावृष्टि के कारण क्षेत्र में करीब 25 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है।पिछले वर्षों में एक परिवार औसतन 10 क्विंटल महुआ एकत्र कर 45 से 50 हजार रुपये तक कमा लेता था, लेकिन इस बार उत्पादन 80% तक घट गया है।बीते वर्ष इसी क्षेत्र से करीब 32 करोड़ रुपये का महुआ व्यापार हुआ था। सरगुजा संभाग में सामान्य वर्षों में महुआ का कारोबार 200 करोड़ रुपये तक पहुंचता है, लेकिन इस बार उत्पादन गिरने से व्यापार भी ठप पड़ गया है।

सरकारी दाम कम, बाजार में ज्यादा कीमत

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा महुआ का समर्थन मूल्य 30 रुपये प्रति किलो तय किया गया है, जबकि बाजार में यह 45 से 50 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है।इसी वजह से ग्रामीण सरकारी खरीदी केंद्रों से दूरी बना रहे हैं।

महुआ पर टिका है पूरा इलाका

ओड़गी ब्लॉक के चांदनी-बिहारपुर क्षेत्र की 35 से अधिक ग्राम पंचायतों के लोग पूरी तरह महुआ पर निर्भर हैं। यह इलाका गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान के घने जंगलों से घिरा हुआ है, जहां से बड़े पैमाने पर महुआ संग्रहण होता है।

मध्यप्रदेश के आदिवासी भी पहुंचते हैं जंगलों में

महुआ सीजन में मध्यप्रदेश के सीमावर्ती 8 से अधिक गांवों के आदिवासी भी इस क्षेत्र में संग्रहण के लिए पहुंचते हैं। इससे जंगलों में दोनों राज्यों के लोगों की आवाजाही बढ़ जाती है।

महुआ खरीदी में भारी गिरावट

स्थानीय व्यापारियों के अनुसार, पहले जहां एक व्यापारी 50 से 100 बोरा महुआ खरीदता था, वहीं इस बार यह घटकर सिर्फ 5 से 10 बोरा रह गया है। बिहारपुर के रेंजर मेवालाल पटेल ने बताया कि बाजार दर और समर्थन मूल्य में अंतर के कारण ग्रामीण महिला स्व-सहायता समूहों को महुआ नहीं बेचते। इस संबंध में 4 वर्ष पूर्व ही शासन को रिपोर्ट भेजकर मूल्य बढ़ाने की मांग की गई थी। बड़े व्यापारियों ने पिछले वर्षों में महुआ को कोल्ड स्टोरेज में रखकर ऊंचे दाम का इंतजार किया, लेकिन इस बार कीमत नहीं बढ़ने से पुराना स्टॉक भी अटका हुआ है।

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